धनबाद कोलियरी कर्मचारी संघ भामसं कार्यालय में सर्व पंथ समादार दिवस का आयोजन

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धनबाद :बुधवार को धनबाद कोलियरी कर्मचारी संघ भारतीय मजदूर संघ कार्यालय विश्वकर्मा भवन धनबाद में भारतीय मजदूर संघ धनबाद जिला के नेतृत्व में गणेश शंकर विद्धार्थी के बलिदान दिवस के उपलक्ष्य में सर्व पंथ समादार दिवस आयोजन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता भामसंघ झा. प्रदेश कार्यसमिति सदस्य रमेश कुमार चौबे ने किया एवं संचालन भामसंघ धनबाद जिला मंत्री धर्मजीत चौधरी ने किया।मुबारक हुसैन संयोजक सर्व पंथ समादर मंच भामसंघ झा. प्रदेश ने इनके जीवनी पर विस्तृत प्रकाश डालाते हुये कहा कि गणेश शंकर विद्यार्थी एक निडर पत्रकार स्वतंत्रता सेनानी और समाज सुधारक थे। इन्होंने ने अपनी कलम को ब्रिटिश शासन के खिलाफ हथियार बनाया। उन्होंने साम्प्रदायिक सौहार्दय के लिए अपने प्राणों की आहुती दे दी। सर्वपंथ समादर मंच भारतीय मजदूर संघ प्रति वर्ष गणेश शंकर विद्यार्थी का बलिदान दिवस 25 मार्च को देश भर में मनाकर साम्प्रदायिक सौहार्दय के सुत्र को सुदृड़ बनाने में प्रयासरत है। इस अवसर विद्यार्थी जी की सम्पूर्ण जीवन हमसभी के लिए प्रेरणा दायी रहेगी। गणेश शंकर विद्यार्थी का जन्म 26 अक्टूबर 1890 को प्रयागराज ईलाहबाद के अतसुरईया जनपद में एक कायस्त परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम मुंशी जयनारयण था जो ग्वालियर रियासत के मुगवाली के एक स्कूल में प्राध्यापक थे। जीवन यापन के लिए उनके पिता अध्यापके के साथ-साथ ज्योतिष के भी कार्य करते थे। गणेश शंकर विद्यार्थी का प्रारंभिक शिक्षा स्थानीय एंगले चर्नेक्यूलर स्कूल में हुआ था। बाद में ईलाहाबाद में सरस्वती एवं अभियोदय पत्रों के सम्पादन में भी काम किये। किन्तु कुछ समय के बाद अस्वस्थ होकर पुनः कानपुर लौट आये और वहाँ से 19 नवम्बर 1918 से अपने नये सप्ताहिक पत्र प्रताप का प्रकाशन प्रारंभकिया। परिणामस्वरूप पत्रिका की दिनो-दिन बढ़ती लोकप्रियता से अंग्रेज शासक के पांव लड़खड़ाने लगें। 1920 में जैसे ही प्रताप सप्ताहिक से दैनिक हुआ तो प्रशासन ने प्रकाशन के साहित्य में बांधा डालने के उद्देश्य से विद्यार्थी जी को झूठे मुकदमे में फंसाकर जेल भेज दिए। और भारी आर्थिक दंण्ड का भुगतान करने पर भी विवश किया। समझौता करने के बजाए विद्यार्थी जी का स्वर अधिक प्रखर होने लगा। स्वाधीनता आंदोलन में विद्यार्थी जी की प्रतिभागिता निरभिक्ता से होती थी। क्रांतिकारियों की सहायता उनके परिवार का भरण पोषण और समान हीं आंदोलन करने में सदैव अग्रसर रहते थे। शहीद भगत सिंह की योजना पूर्णरूपेन सफल हो इस दृष्टि से उन्हें अपने पास रखकर सभी प्रकार की सहायता प्रदान करते रहने वाल हमारे गौख बने शंकर विद्यार्थी। गणेश शंकर विद्यार्थी ने अपनी तपस्थली कानपुर में 25 मार्च 1931 को साम्प्रदायिक सौहार्दय अक्षुन्न बनाने रखने के लिए दंगाईयों के बीच गये और हजारो लोगों की जान बचाई। लेकिन इसी बीच दंगाईयों ने उन पर हमला कर दिया और उनकी जान चली गई। तरह उन्होंने ने समाज में सौहार्दय और समरस्ता कायम करने के लिए अपनी बलिदान दे दी।
धर्मजीत चौधरी मंत्री भामसंघ धनबाद जिला ने कहा कि विद्यार्थी जी कम्पोजिंग, मशीन छपाई एवं पत्रिका के वाहन वितरण का कार्य स्वयं करना पड़ता था। इन्होने 16 वर्ष की आयु में हमारी आत्मोसवर्गता नामक पुस्तक लिखी, प्रमुख लेख में सरस्वती, कर्मयोगी हीत वार्ता, स्वराज में भी देश भक्ति लेख प्रकाशित होते रहता था। 22 अगस्त 1918 में प्रताप में प्रकाशित नानक सिंह की सौदा ए वतन, नामक कविता प्रकाशित होने से अग्रेज सरकार काफी आक्रोशित हुआ। इससे नाराज होकर उनपर राजद्रोह का आरोप भी लगाया गया। उन्होनें अपनी कलम से सुधार की क्रांन्ति उत्पन्न की। मौके पर कामदेव महतो, प्रशांत नियोगी, शुशील कुमार सिंह, शिव प्रसाद वर्मा, शुशील कुमार सिंह, नवनीत सिंह, तेजनारायण शर्मा, राजेश कुमार, तारकेश्वर सिंह, शंकर चौहान, सत्यनारायण यादव, संतोष सिंह, रंजीत कुमार विल्लु, कादीर अली, वंसीधर प्रसाद, रिजु साव, रामजीत माँझी, महेश यादव, अमित कुमार, जयराम कुमार सिंह, चन्द्रभूषण प्रसाद, वालेश्वर प्रसाद कुशवाहा, प्रभात कुमार सिंह, कृष्ण कन्हैया सिंह, इन्दु देवी संतोष कुमार सिन्हा आदि उपस्थित थे।

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