जमशेदपुर (JAMSHEDPUR):
सोशल मीडिया की रील और व्यू की अंधी दौड़ ने झारखंड के एक साधारण से युवक की ज़िंदगी को मुश्किल बना दिया है। वही लड़का, जो अपने काम के दौरान सहज अंदाज़ में “ले बेटा…” कहते हुए एक लोकल गाना गुनगुनाता था, आज कैमरों से बचता फिर रहा है।
शुरुआत में जब लोग 10–20 रुपये देकर उससे गाना सुनने की फरमाइश करने लगे, तो उसे भी यह सब अच्छा लगा। उसे लगा कि लोग उसके अंदाज़ को पसंद कर रहे हैं। लेकिन कुछ ही दिनों में हालात बदल गए। मोबाइल कैमरे, यूट्यूब चैनल और इंस्टाग्राम रील बनाने वालों की भीड़ उसके पीछे पड़ गई। वह भागने लगा, छिपने लगा, झुंझलाने लगा—यहाँ तक कि कभी-कभी गुस्से में गालियाँ और पैसे फेंकने जैसी हरकतें भी करने लगा।
जिस दिनचर्या में वह खुश था, जो उसकी पहचान थी, वही उससे छिन गई। हालात इतने बिगड़ गए कि आज इंटरनेट पर उसका नाम सर्च करने पर तरह-तरह की अफवाहें दिखाई देती हैं—कहीं जेल की खबर, कहीं मौत की झूठी सूचनाएँ। यह सब सोशल मीडिया की संवेदनहीनता और नैतिक गिरावट की एक भयावह तस्वीर पेश करता है।
सच यह है कि वह कोई पेशेवर गायक नहीं है। जैसे आम लोग काम करते हुए बेसुरे ही सही, गुनगुनाते रहते हैं, वैसे ही वह भी गाता था। जमशेदपुर की बोलचाल के कुछ स्थानीय शब्द—जैसे “ले बेटा”, “अबे”, “होंडू”—बाहर के लोगों को अटपटे और मज़ेदार लगे, और बस वहीं से उसकी एक वीडियो वायरल हो गई। इसके बाद वह चाहकर भी इस चक्र से बाहर नहीं निकल पाया।
उसे असल खुशी अपने दोस्तों, अपने काम और अपनी साधारण ज़िंदगी में मिलती थी। लेकिन व्यूज़ की भूख ने उसे एक तमाशे में बदल दिया। दिन भर वही गाना, वही लाइन, वही अंदाज़—कितनी बार? कब तक? उसके पास सीमित बातें थीं, लेकिन रिकॉर्ड करने वालों की संख्या लगातार बढ़ती गई। अब वह ऐसा महसूस कर रहा है जैसे कोई पंछी जाल में फँस गया हो।
पिछले कुछ वर्षों में सोशल मीडिया पर अचानक मशहूर हुए कई लोगों की कहानियाँ देखी जा सकती हैं—रानू मंडल, मोनालिसा, ढाबे वाले बुज़ुर्ग, आईआईटी बाबा और अब यह युवक ‘धूम’। बाहर से देखने पर लगता है कि प्रसिद्धि ने उन्हें सब कुछ दे दिया, लेकिन भीतर से उनकी ज़िंदगी उलट-पुलट हो गई। वे अपनी सहज प्रकृति से दूर हो गए और अंत में उसी भीड़ के निशाने पर आ गए जिसने उन्हें सिर पर चढ़ाया था।
यह स्थिति उस फिल्म की याद दिलाती है, जिसमें गाँव में पला-बढ़ा एक भोला युवक अचानक शहर की चकाचौंध में पहुँचा दिया जाता है। सुविधाएँ, पैसा और लोग—सब कुछ होने के बावजूद वह वहाँ खुश नहीं रह पाता, क्योंकि उसका मन तो उसी साधारण दुनिया में बसता है जहाँ से वह आया था।
हर व्यक्ति की अपनी सीमा और अपनी जीवनशैली होती है। शोहरत, पैसा और पहचान आकर्षक ज़रूर हैं, लेकिन जब इसके बदले इंसान को अपनी स्वतंत्रता और सुकून खोना पड़े, तो यह सौदा भारी पड़ जाता है। ‘धूम’ भी अब पीछे हटना चाहता है, लेकिन सोशल मीडिया की भूखी भीड़ उसे चैन से जीने नहीं दे रही।