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“मनरेगा” का नाम बदलने पर झारखंड सीएम हेमंत सोरेन ने उठाए सवाल

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केंद्र सरकार मनरेगा से जुड़े मजदूरों के अधिकारों को कमजोर करने की दिशा में बड़ा कदम उठाने जा रही है। महात्मा गांधी, जिनकी 1948 में नाथूराम गोडसे द्वारा हत्या की गई थी, उनके विचारों को बीते 11 वर्षों से योजनाबद्ध तरीके से हाशिये पर डालने का प्रयास किया जा रहा है। इसी कड़ी में अब महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) को समाप्त करने अथवा उसका स्वरूप बदलने के लिए नया विधेयक लाया जा रहा है।

यह गंभीर सवाल खड़ा करता है कि मजदूरों के अधिकारों से जुड़े कानून से गांधी जी की गरीबी उन्मूलन, विकेंद्रीकरण और सामाजिक सद्भाव की सोच को हटाकर किसी विशेष धार्मिक पहचान से जोड़ने की कोशिश क्यों की जा रही है। यह केवल नाम परिवर्तन का मामला नहीं है, बल्कि प्रस्तावित विधेयक ग्रामीण श्रमिकों के काम के अधिकार पर सीधा प्रहार करता है।

जैसे केंद्र सरकार लगातार कल्याणकारी योजनाओं के बजट में कटौती कर रही है और राज्यों के संवैधानिक अधिकारों का केंद्रीकरण कर रही है, उसी तरह अब मनरेगा को समाप्त कर ‘विकसित भारत–जी राम जी’ जैसी प्रस्तावित योजना के माध्यम से वही नीति लागू की जा रही है।

वर्तमान में मनरेगा के तहत देश के सभी ग्रामीण मजदूरों को काम पाने का कानूनी अधिकार है, लेकिन नई योजना में यह अधिकार सीमित कर दिया जाएगा। केंद्र सरकार तय करेगी कि योजना कहां लागू होगी और कहां नहीं। इतना ही नहीं, साल में दो महीने तक काम के अधिकार पर रोक लगाने का भी प्रस्ताव है। अधिकार आधारित कानून के विपरीत अब केंद्र यह भी तय करेगी कि किसी राज्य को कितना बजट मिलेगा और आवश्यकता बढ़ने पर अतिरिक्त सहायता से हाथ खींच लेगी। यह सीधे तौर पर रोजगार के अधिकार को समाप्त करने की साजिश है।

एक ओर केंद्र सरकार झारखंड के खनिज संसाधनों से होने वाली आय का बकाया राज्य को नहीं दे रही है, वहीं दूसरी ओर ग्रामीण रोजगार योजना में राज्य सरकार से 40 प्रतिशत खर्च वहन करने की बात कर रही है। पहले केंद्र को झारखंड का 1.36 लाख करोड़ रुपये और अन्य योजनाओं का बकाया देना चाहिए, उसके बाद अतिरिक्त आर्थिक बोझ की बात करनी चाहिए।

हमारी सरकार गरीबों, किसानों और मजदूरों के हितों के लिए प्रतिबद्ध है। किसी भी हाल में मजदूरों के संवैधानिक अधिकारों को खत्म नहीं होने दिया जाएगा। मनरेगा कानून संसद में सभी दलों की सहमति से पारित हुआ था। यदि इसे कमजोर या समाप्त करने की कोशिश की गई, तो झारखंड के मजदूर और राज्य सरकार सड़क से लेकर संसद तक संघर्ष करने के लिए पूरी तरह तैयार हैं।

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