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“झारखंड ने खोया अपना पथप्रदर्शक… दिशोम गुरु शिबू सोरेन पंचतत्व में विलीन”

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झारखंड की राजनीति, आदिवासी चेतना और सामाजिक न्याय की नींव रखने वाले दिशोम गुरु शिबू सोरेन आज पंचतत्व में विलीन हो गए। रामगढ़ जिले के गोला प्रखंड स्थित उनके पैतृक गांव नेमरा में पूरे राजकीय सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार किया गया।

मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने पुत्र धर्म निभाते हुए पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ अपने पिता को मुखाग्नि दी। यह दृश्य इतना भावुक था कि वहां उपस्थित हर आंख नम हो गई। उस क्षण मानो पूरा झारखंड थम गया था—एक युग के अंत की अनुभूति सबको हो रही थी।

रांची के मोरहाबादी स्थित आवास से जब गुरुजी का पार्थिव शरीर अंतिम दर्शन के लिए नेमरा गांव लाया गया, तो जनसैलाब उमड़ पड़ा। न जात-पात, न धर्म, न राजनीति की सीमाएं—हर वर्ग, हर समाज, हर पीढ़ी का प्रतिनिधित्व इस अंतिम यात्रा में शामिल था। आम जनता से लेकर विशिष्टजन तक—हर कोई गुरुजी को अंतिम विदाई देने आया।

“गांव ने झुककर किया सलाम…”
जैसे ही नेमरा गांव की मिट्टी ने अपने बेटे को आखिरी बार देखा, पूरा गांव झुक गया। गांव की गलियों में सन्नाटा पसरा रहा, कई घरों में चूल्हे नहीं जले। आंसुओं के सैलाब में भी लोगों की आंखों में गौरव झलक रहा था—एक ऐसा गौरव जो उस नेता के लिए था जिसने जमीन से उठकर झारखंड को आकार दिया।

गांववालों ने कहा, “गुरुजी केवल नेता नहीं थे, वे झारखंड आंदोलन की आत्मा थे।”
उनका संघर्ष, उनका सादगीभरा जीवन और आदिवासी अधिकारों के लिए उनका समर्पण उन्हें आम जनता का मसीहा बना गया।

“जनसैलाब ने दी गवाही…”
गुरुजी की अंतिम यात्रा में उमड़ा अपार जनसमूह इस बात की गवाही दे गया कि —
“नेता तो बहुत हुए, लेकिन दिशा दिखाने वाला सिर्फ एक था — दिशोम गुरु शिबू सोरेन।”

“जोहार गुरुजी”
झारखंड ने आज अपने सबसे बड़े पथप्रदर्शक को खो दिया। लेकिन दिशोम गुरु की विरासत, उनका संघर्ष, और उनका सपना इस माटी में हमेशा जिंदा रहेगा।

हर झारखंडवासी की जुबान पर आज एक ही शब्द है —
“जोहार गुरुजी… आपका कर्ज हम कभी नहीं चुका पाएंगे।”

कुसुम न्यूज़ रिपोर्ट

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