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डांडी चूआ के भरोसे 500 की जिंदगी: सड़क नहीं, एम्बुलेंस नहीं… विकास से कोसो दूर झगरू गाँव”।

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धनबाद… जिसे “कोयले की राजधानी” कहा जाता है।
जहाँ शहरों में विकास की चमक साफ दिखाई देती है…

लेकिन इसी जिले के टुंडी प्रखंड में एक ऐसा आदिवासी गाँव है,
जहाँ आज भी लोग बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

हम बात कर रहे हैं बैंगनरिया पंचायत के झगरू जमुनिया कोचा गाँव की…
जहाँ करीब 500 की आबादी एक छोटे से डांडी चूआ के भरोसे अपनी जिंदगी गुजार रही है।

भीषण गर्मी में पानी की किल्लत विकराल रूप ले लेती है…
और बरसात आते ही सड़क की हालत ऐसी हो जाती है कि गाँव का संपर्क पूरी तरह टूट जाता है।

पहाड़ी की तलहटी में बसे इस गाँव की तस्वीरें
विकास के दावों की हकीकत बयां करती हैं।

गाँव में पीने के पानी की कोई ठोस व्यवस्था नहीं है।
एकमात्र सहारा है डांडी चूआ…
जहाँ से ग्रामीण गंदा पानी पीने को मजबूर हैं।

गर्मी के दिनों में जब यह चूआ सूख जाता है,
तो लोगों को घंटों इंतजार करना पड़ता है…
ताकि थोड़ा-बहुत पानी इकट्ठा हो सके।

गाँव में दो छोटे जल मीनार बने तो हैं…
लेकिन वे सिर्फ शो-पीस बनकर रह गए हैं।
वहीं एक बड़ा जलमीनार आज भी अधूरा खड़ा है।

सिर्फ पानी ही नहीं…
सड़क की हालत भी बेहद खराब है।

मुख्य सड़क से गाँव तक आने वाली करीब 2 किलोमीटर की सड़क जर्जर है…
बरसात के दिनों में यह सड़क कीचड़ में तब्दील हो जाती है…
जिससे गाँव का संपर्क पूरी तरह कट जाता है।

अगर कोई बीमार पड़ जाए…
या किसी गर्भवती महिला को अस्पताल ले जाना हो…
तो ग्रामीणों के पास ‘खाट’ ही एकमात्र सहारा होता है।

यहाँ तक कि मोबाइल नेटवर्क भी नहीं है…
जिससे आपातकालीन स्थिति में एम्बुलेंस या पुलिस को सूचना देना भी संभव नहीं हो पाता।

बुनियादी सुविधाओं की कमी का असर अब सामाजिक जीवन पर भी दिखने लगा है…
लोग इस गाँव में अपनी बेटियों की शादी करने से भी कतराने लगे हैं।

झगरू जमुनिया कोचा गाँव की ये तस्वीरें बताती हैं कि
आज भी कई इलाके विकास की मुख्यधारा से कोसों दूर हैं…

जहाँ पानी, सड़क और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाएं
आज भी एक सपना बनी हुई हैं…

अब देखना होगा कि प्रशासन और जनप्रतिनिधि
कब तक इनकी सुध लेते हैं।

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