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अनीता अग्रवाल का संघर्ष से सेवा तक की प्रेरणादायक यात्रा

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धनबाद :साधारण नाम लेकिन असाधारण कार्य—अनीता अग्रवाल। पिछले लगभग बीस वर्षों से उनका जीवन दिव्यांग बच्चों के लिए समर्पित रहा है। उनकी यह यात्रा किसी बड़े मंच से नहीं, बल्कि अपने ही घर से शुरू हुई। अपने ही दिव्यांग बच्चे के संघर्ष को देखकर उनके मन में एक बीज अंकुरित हुआ—ऐसा बीज जो आज एक विशाल बरगद के पेड़ का रूप ले चुका है। यही बीज आगे चलकर नारायणी चैरिटेबल ट्रस्ट और पहला कदम जैसे दिव्यांगों के समर्पित संस्थान में विकसित हुआ, जो आज केवल धनबाद ही नहीं बल्कि पूरे झारखंड और राष्ट्रीय स्तर पर एक पहचान बना चुका है।
अनीता अग्रवाल का सपना केवल सेवा करना नहीं था, बल्कि हर दिव्यांग बच्चे को शिक्षा, चिकित्सा, प्रशिक्षण और सम्मान के साथ समाज की मुख्यधारा से जोड़ना था। उन्होंने यह ठान लिया कि कोई भी बच्चा अपनी शारीरिक या मानसिक चुनौती के कारण जीवन में पीछे न रह जाए। इसी सोच के साथ पहला कदम की स्थापना हुई, जहाँ दिव्यांग बच्चों को निःशुल्क शिक्षा, चिकित्सा सहायता, पुनर्वास , तथा विभिन्न प्रकार की वोकेशनल ट्रेनिंग दी जाती है।आज इस संस्थान के माध्यम से सैकड़ों बच्चे न केवल पढ़ाई कर रहे हैं, बल्कि अपने पैरों पर खड़े होकर आत्मनिर्भर बन रहे हैं। कोई संगीत के क्षेत्र में आगे बढ़ रहा है, कोई खेल में, तो कोई कला और हुनर के माध्यम से अपनी पहचान बना रहा है। कई बच्चे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन कर चुके हैं, जिससे यह साबित होता है कि अवसर मिलने पर दिव्यांग बच्चे भी समाज में असाधारण उपलब्धियां हासिल कर सकते हैं।
अनीता अग्रवाल का संघर्ष केवल शिक्षा और चिकित्सा तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने दिव्यांग युवाओं को रोजगार से जोड़ने के लिए अनेक पहल कीं। किसी को सिलाई मशीन देकर स्वावलंबी बनाया, किसी को कैंडल मेकिंग, पेपर प्लेट मेकिंग, कंप्यूटर ट्रेनिंग, या अन्य व्यावसायिक प्रशिक्षण से जोड़ा। कई बच्चों के लिए दुकानें खुलवाईं और आज तो क्लाउड किचन जैसे आधुनिक रोजगार मॉडल के माध्यम से भी दिव्यांग युवाओं को आत्मनिर्भर बनाने का प्रयास किया जा रहा है।
उनकी मेहनत और समर्पण के कारण आज पहला कदम दिव्यांगों के लिए एक रोल मॉडल प्रोजेक्ट बन चुका है, जिसे देखने और समझने के लिए देशभर से लोग आते हैं। संस्थान के प्रांगण में कई बड़ी हस्तियां, उद्योगपति, समाजसेवी और सरकारी अधिकारी आ चुके हैं। राज्य के उच्च पदाधिकारी, राज्यपाल, राष्ट्रपति तक ने इस कार्य की सराहना की है। कई प्रतिष्ठित संस्थानों और उद्योग समूहों के प्रतिनिधि यहाँ आकर बच्चों की प्रतिभा और अनीता अग्रवाल के समर्पण को देखकर प्रभावित हुए हैं।अनीता अग्रवाल को उनके उत्कृष्ट सामाजिक कार्यों के लिए अनेक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है। लेकिन उनके लिए सबसे बड़ा सम्मान उन बच्चों की मुस्कान है, जो कभी असहाय थे और आज आत्मविश्वास के साथ जीवन जी रहे हैं।उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे अपने हर सहयोगी और दानदाता के प्रति समान सम्मान रखती हैं। उनके लिए एक सब्जी बेचने वाला छोटा दानदाता भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना किसी बड़ी कंपनी का मालिक। वे हमेशा कहती हैं कि यह संस्थान समाज की सामूहिक आस्था और सहयोग से ही आगे बढ़ रहा है।
अनीता अग्रवाल का जीवन हमें यह सिखाता है कि सच्चा सेवा भाव किसी एक व्यक्ति की सीमित सोच नहीं, बल्कि समाज को बदलने की शक्ति बन सकता है। उनका एक ही मंत्र है कर कर्म तो हो फल अच्छा, नर सेवा ही नारायण सेवा है।आज उनका संकल्प है कि ऐसा एक समर्पित संस्थान बने जहाँ दिव्यांग बच्चे पूरी तरह सामान्य और सम्मानपूर्ण जीवन जी सकें।उनका नारा आज हजारों लोगों के लिए प्रेरणा बन चुका है “दिव्यांग हमारा है”।

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