धनबाद: दुर्गा पूजा के उल्लास में ढाक और ढोल की पारंपरिक धुन चार चांद लगा देती है। इन वाद्ययंत्रों की गूंज न केवल श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करती है, बल्कि उन्हें थिरकने पर भी मजबूर कर देती है। धनबाद के तेतुलतल्ला में इन दिनों मुर्शिदाबाद से आई 11 सदस्यीय टीम अपनी अनूठी प्रस्तुति से लोगों का मन मोह रही है। टीम के सदस्य हिंदी, बांग्ला और नागपुरी गीतों की धुन पर ढोल-ढाक बजाकर पूजा पंडाल की रौनक बढ़ा रहे हैं।
टीम के सदस्य चंदन दास ने बताया कि उनका परिवार चार पीढ़ियों से इस पारंपरिक कला से जुड़ा हुआ है। पूजा-पर्व, त्योहार और शादी-विवाह जैसे विभिन्न आयोजनों में ढोल-ढाक बजाना उनके परिवार की परंपरा रही है। हालांकि, साल के अन्य दिनों में परिवार के सदस्य खेती-बाड़ी कर जीविकोपार्जन करते हैं। दुर्गा पूजा उनके लिए रोजगार का अवसर होने के साथ-साथ अपनी सांस्कृतिक विरासत को जीवंत बनाए रखने का माध्यम भी है।
18 वर्षों से तेतुलतल्ला से जुड़ा है टीम का नाता
चंदन दास ने बताया कि उनकी टीम पिछले 18 वर्षों से दुर्गा पूजा के अवसर पर तेतुलतल्ला आती रही है। यहां पारंपरिक वाद्ययंत्रों की प्रस्तुति देना अब उनकी परंपरा का हिस्सा बन चुका है। हर वर्ष की तरह इस बार भी टीम के सदस्य अपनी अलग-अलग धुनों से श्रद्धालुओं को आकर्षित कर रहे हैं। इस बार चंदन दास का 10 वर्षीय बेटा रोहित दास भी टीम के साथ आया है। उसके शामिल होने से परिवार की अगली पीढ़ी को इस पारंपरिक कला को सीखने और आगे बढ़ाने का अवसर मिल रहा है।
कुड़कुड़ी धुन ने बांधा समां, कलाकारों को किया सम्मानित
टीम के सदस्य अभिजीत दास ने बताया कि अशोक दास, कृष्ण दास और भास्कर दास मुख्य रूप से गीत-संगीत की प्रस्तुति देते हैं। टीम की विशेष कुड़कुड़ी धुन लोगों के बीच खास आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। ढोल-ढाक की लय और पारंपरिक संगीत की मिठास से पूजा पंडाल में उत्सव का माहौल और भी खुशनुमा हो रहा है।
टीम की प्रस्तुति से प्रभावित होकर जेम्स एंड हार्पर के क्षेत्रीय प्रबंधक गोपाल चक्रवर्ती और समाजसेवी भरत प्रसाद ने कलाकारों को सम्मानित किया। मुर्शिदाबाद से आए इन कलाकारों की प्रस्तुति दुर्गा पूजा में लोक संस्कृति और पारंपरिक संगीत की अनूठी छटा बिखेर रही है। चार पीढ़ियों से चली आ रही यह कला आज भी नई पीढ़ी तक पहुंच रही है और त्योहारों की सांस्कृतिक पहचान को समृद्ध बना रही है।