देश के लिए जान न्योछावर करने वाले जवानों को लेकर बड़े-बड़े दावे और सम्मान की बातें अक्सर सुनने को मिलती हैं। लेकिन जब कैमरे हट जाते हैं और समय गुजर जाता है, तब कई शहीद परिवार खुद को सिस्टम और समाज के बीच अकेला पाते हैं। ऐसी ही एक दर्दनाक कहानी है ‘ऑपरेशन सिंदूर’ में शहीद हुए रामबाबू सिंह की पत्नी अंजलि की, जो आज अपनी 8 महीने की बच्ची के साथ बदहाली में जीवन गुजारने को मजबूर हैं।
भीओ–ऑपरेशन सिंदूर’ में देश के लिए शहादत देने वाले रामबाबू सिंह का बलिदान अभी एक साल भी पूरा नहीं हुआ है। लेकिन उनकी पत्नी अंजलि के लिए यह समय किसी लंबी परीक्षा से कम नहीं रहा। कभी मंचों से सम्मान और मदद के वादे किए गए, लेकिन आज अंजलि सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने को मजबूर हैं।
भीओ —बिहार सरकार की ओर से शहीद परिवार को 50 लाख रुपये मुआवजा और सरकारी नौकरी देने की घोषणा हुई थी। लेकिन अंजलि का आरोप है कि अब तक उन्हें केवल आश्वासन ही मिला है। हर दफ्तर में उन्हें प्रक्रिया और फाइलों का हवाला देकर लौटा दिया जाता है।सब लोग बोले थे मदद होगी, लेकिन आज बच्ची को लेकर संघर्ष करना पड़ रहा है। कहीं से कोई सहारा नहीं मिल रहा।”
— अंजलि का दर्द सिर्फ सरकारी लापरवाही तक सीमित नहीं है। उनका कहना है कि पति की शहादत के बाद ससुराल वालों का व्यवहार भी बदल गया। संपत्ति और अधिकार को लेकर विवाद खड़ा हो गया, जिससे उनकी परेशानियां और बढ़ गईं।सीवान स्थित घर की चाबी तो अंजलि को दे दी गई, लेकिन वहां सुरक्षा और रहने की स्थिति को लेकर चिंता बनी हुई है। एक अकेली महिला अपनी दूधमुंही बच्ची के साथ खुद को असुरक्षित महसूस कर रही है।
भीओ —झारखंड धनबाद की रहने वाली अंजलि अब अपनी जन्मभूमि से भी उम्मीद लगाए बैठी हैं। उनका सवाल है कि क्या झारखंड सरकार ‘झारखंड की बेटी’ होने के नाते उनकी और उनकी बच्ची की मदद के लिए आगे आएगी अंजलि धनबाद में कई प्रतियोगियों में गिल्ड मेडल तक जीत चुकी है और धनबाद उपायुक्त से सम्मान मिल चुका अंजलि का कहना है कि धनबाद में पिछले कई महीनों से रह रही हूं पर अभी तक यहां के नेता या सांसद विधायक तक भी मिलने नहीं आए।
फाइनल भीओ— यह कहानी सिर्फ एक परिवार की नहीं, बल्कि उस सिस्टम पर बड़ा सवाल है जो शहादत के समय सम्मान तो देता है, लेकिन समय बीतने के बाद परिवारों को संघर्ष के लिए छोड़ देता है। अब देखना होगा कि सरकारें और प्रशासन इस शहीद परिवार की पुकार कब सुनते हैं।