- पहले प्रयास में तीन सरकारी नौकरियां, बैंकिंग में बनाया सफल करियर।
- दोस्त उत्पल मजूमदार ने दिया मस्ताना नाम, और छा गए उपेंद्र।
धनबाद। दिन में बैंक की जिम्मेदारियां और खाली समय में सुरों की साधना। पुटकी 2 नंबर की गलियों से निकलकर देश के विभिन्न शहरों के मंचों तक पहुंचने वाले उपेन्द्र मालाकार का सफर जुनून, मेहनत और अपने सपनों को जिंदा रखने की प्रेरक कहानी है। एक सफल बैंकर होने के साथ वह आज किशोर कुमार के गीतों की प्रस्तुति के लिए संगीत प्रेमियों के बीच अपनी अलग पहचान बना रहे हैं। उनके चाहने वाले उन्हें प्यार से ‘मस्ताना’ के नाम से जानते हैं।
पुटकी हाई स्कूल से शिक्षा प्राप्त उपेन्द्र मालाकार ने वर्ष 1997 में पहले ही प्रयास में तीन सरकारी नौकरियां हासिल की थीं। उन्होंने बैंकिंग क्षेत्र को अपना करियर चुना और जालंधर से नौकरी की शुरुआत की। वर्तमान में वह पटना में एक सरकारी बैंक में सीनियर मैनेजर हैं।
बचपन से संगीत के शौकीन उपेन्द्र के जीवन में वर्ष 2018 में जमशेदपुर के दुर्गापूजा समारोह ने नया मोड़ ला दिया। लोगों से दूर बैठकर किशोर कुमार के गीत गा रहे उपेन्द्र की आवाज ने संगीतप्रेमियों का ध्यान खींचा। प्रोत्साहन मिलने के बाद उन्होंने स्वर्गीय सीतानाथ मल्लिक के मार्गदर्शन में नियमित रियाज शुरू किया।
वर्ष 2019 में रायपुर के एक बड़े कार्यक्रम में उनके द्वारा गाए गए ‘ओ मेरे दिल के चैन’ को मिली सराहना ने मंचीय गायन का रास्ता खोल दिया। इसके बाद उन्होंने कई शहरों में अपनी प्रस्तुतियां दीं। संगीत के साथ अब वह अभिनय पर भी फोकस कर रहे हैं और वर्ष 2022 में एक थिएटर नाटक में इंस्पेक्टर की भूमिका निभाकर अपनी प्रतिभा का परिचय दिया।
उपेन्द्र कहते हैं कि इस खूबसूरत सफर में परिवार और दोस्तों ने उनका हमेशा हौसला बढ़ाया। बचपन के जिगरी दोस्त उत्पल मजूमदार उर्फ ‘नेताजी’, उनके बड़े भाई सुभाष दा, जमशेदपुर के पूजा सचिव अभिजीत भट्टाचार्य, दोनों बेटे उमंग और उत्सव तथा चंडीगढ़ में रहने वाले भतीजे रिशु का उन्हें लगातार सहयोग मिला। लेकिन वह सबसे अधिक श्रेय अपनी पत्नी विनिता को देते हैं, जिन्होंने हर परिस्थिति में उनका साथ दिया और संगीत के जुनून को आगे बढ़ाने का हौसला दिया। दोस्त उत्पल मजूमदार ने ही उन्हें ‘मस्ताना’ नाम दिया, जो आज उनकी मंचीय पहचान बन चुका है। उपेन्द्र की कहानी बताती है कि जिम्मेदारियों के बीच भी अपने शौक को जिंदा रखा जाए तो प्रतिभा को पहचान मिलने में कभी देर नहीं होती। जरूरत सिर्फ खुद पर भरोसे और लगातार मेहनत की है।