पाकुड़ के होली बाजार में इस बार सिर्फ रंगों की रौनक नहीं है, बल्कि गांव की महिलाओं की मेहनत और आत्मविश्वास की भी झलक दिख रही है। यहां बिक रहा हर्बल गुलाल न केवल त्योहार को खास बना रहा है, बल्कि कई परिवारों की आजीविका का सहारा भी बन रहा है।
स्थानीय महिलाओं को मिला नया मंच
हाटपाड़ा और गाँधी चौक के बाजारों में इस बार ‘पलाश’ नाम से हर्बल गुलाल उपलब्ध है। इसे तैयार करने वाली महिलाएं स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी हैं। प्रशिक्षण लेने के बाद उन्होंने प्राकृतिक सामग्री से रंग बनाना शुरू किया और अब उनका उत्पाद खुले बाजार में बिक रहा है।
इन रंगों की खासियत यह है कि इनमें रासायनिक तत्वों के बजाय प्राकृतिक स्रोतों का उपयोग किया गया है—हरे रंग के लिए पालक, गुलाबी के लिए चुकंदर, पीले-नारंगी के लिए पलाश और हल्दी, जबकि नीले रंग के लिए स्थानीय फूल-पत्तियों का इस्तेमाल किया गया है। हल्की खुशबू के लिए प्राकृतिक एसेंस भी मिलाया गया है।
त्योहार के साथ आय का साधन
इस बार 5 से 10 क्विंटल तक हर्बल गुलाल बाजार में लाने की तैयारी है। बिक्री से होने वाली आय सीधे महिलाओं के बीच बांटी जाएगी। इससे उन्हें अतिरिक्त आमदनी के साथ आत्मनिर्भर बनने का अवसर मिल रहा है। समूह की सदस्य सीमा देवी के मुताबिक, पहले यह काम घरेलू स्तर तक सीमित था, लेकिन अब यह आजीविका का माध्यम बन चुका है।
रंगों में घुली उम्मीद
होली के अवसर पर लगाए गए स्टॉल्स पर लोग प्राकृतिक गुलाल को प्राथमिकता दे रहे हैं। रसायनमुक्त रंगों की मांग बढ़ रही है, जिससे स्थानीय महिलाओं के प्रयासों को प्रोत्साहन मिल रहा है।
इस तरह पाकुड़ में इस बार होली के रंग सिर्फ चेहरों पर ही नहीं, बल्कि महिलाओं के सपनों और आत्मनिर्भरता की राह पर भी चमक बिखेर रहे हैं।