हैदराबाद: यह मामला किसी क्राइम थ्रिलर से कम नहीं है। कहानी की शुरुआत मशहूर हैदराबादी बिरयानी से हुई और मामला देश के बड़े टैक्स घोटालों में से एक तक जा पहुंचा। जांच में खुलासा हुआ कि कुछ रेस्टोरेंट्स बिलिंग सॉफ्टवेयर में हेरफेर कर करीब 70,000 करोड़ रुपये की टैक्स चोरी कर रहे थे।
कैसे शुरू हुई जांच?
एक राष्ट्रीय अखबार की रिपोर्ट के मुताबिक, शुरुआत तेलंगाना और आंध्र प्रदेश के कुछ रेस्टोरेंट्स की सामान्य जांच से हुई। अधिकारियों को रेस्टोरेंट्स में भारी भीड़ और घोषित आय के बीच बड़ा अंतर नजर आया। संदेह गहराने पर जांच एजेंसियों ने उस डिजिटल बिलिंग सॉफ्टवेयर की पड़ताल की, जिसका इस्तेमाल देशभर के लगभग 1.77 लाख रेस्टोरेंट्स कर रहे हैं।
तकनीक से खुला राज
जांच एजेंसियों ने आधुनिक तकनीक का सहारा लिया।
- करीब 60 टेराबाइट डेटा की गहन जांच की गई।
- आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डिजिटल फॉरेंसिक टूल्स का इस्तेमाल हुआ।
- रेस्टोरेंट्स के बिक्री रिकॉर्ड का मिलान उनके GST नंबर और अन्य आधिकारिक दस्तावेजों से किया गया।
किस तरह छिपाई गई कमाई?
जांच में कई चौंकाने वाले तरीके सामने आए:
- बिल हटाना: ग्राहकों से भुगतान लेने के बाद सिस्टम से बिल डिलीट कर दिए जाते थे। अनुमान है कि लगभग 13,000 करोड़ रुपये के बिल इस तरह हटाए गए।
- कैश ट्रांजैक्शन का दुरुपयोग: नकद भुगतान को ट्रैक करना कठिन होने का फायदा उठाकर कई रेस्टोरेंट्स केवल कैश वाले बिल रिकॉर्ड से गायब कर देते थे।
- पूरा डेटा मिटाना: कुछ मामलों में पूरे दिन या महीने का बिक्री डेटा ही हटा दिया गया और टैक्स विभाग को कम आय दिखाई गई।
- रिटर्न में हेरफेर: कहीं-कहीं बिल मौजूद थे, लेकिन टैक्स रिटर्न में जानबूझकर कम आंकड़े दिखाए गए।
किन राज्यों में ज्यादा गड़बड़ी?
जांच के मुताबिक कुल बिक्री का लगभग 25% हिस्सा छिपाया जा रहा था।
- टैक्स चोरी के मामलों में कर्नाटक सबसे आगे पाया गया।
- इसके बाद तेलंगाना और तमिलनाडु का स्थान रहा।
- आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में ही करीब 5,100 करोड़ रुपये की अघोषित बिक्री सामने आई।
- केवल 40 रेस्टोरेंट्स की मौके पर जांच में 400 करोड़ रुपये की अनियमितता पाई गई।
आगे क्या?
एजेंसियों का मानना है कि 70,000 करोड़ रुपये का आंकड़ा सिर्फ एक बिलिंग सॉफ्टवेयर की जांच से सामने आया है। बाजार में ऐसे कई अन्य सॉफ्टवेयर भी प्रचलित हैं। यदि उनकी भी जांच हुई, तो घोटाले का दायरा और बढ़ सकता है। फिलहाल डिजिटल फॉरेंसिक के जरिए पूरे नेटवर्क की गहन पड़ताल जारी है, ताकि भविष्य में इस तरह की डिजिटल टैक्स चोरी पर रोक लगाई जा सके।