नई दिल्ली: इंडिया AI इम्पैक्ट समिट में जियो पवेलियन पर प्रस्तुत “जियो-शिक्षा क्लासरूम” मॉडल ने अभिभावकों और विद्यार्थियों का खास ध्यान आकर्षित किया। इसे केवल तकनीकी प्रदर्शन नहीं, बल्कि शिक्षा प्रणाली में बदलाव की संभावनाओं के रूप में देखा जा रहा है। देश में करोड़ों छात्र अब भी पारंपरिक पद्धति से पढ़ाई कर रहे हैं, ऐसे में इस पहल का उद्देश्य स्कूलों को भविष्य में AI आधारित लर्निंग हब में बदलना है।
इस मॉडल की नींव दो प्रमुख उपकरणों—जियो ई-बोर्ड और जियो ई-बुक—पर टिकी है, जो क्लाउड तकनीक से आपस में जुड़े हैं। शिक्षक जो भी सामग्री बोर्ड पर पढ़ाते हैं, वह सीधे छात्रों की ई-बुक में उपलब्ध हो जाती है। इससे कॉपी में नोट्स उतारने की आवश्यकता कम हो जाती है और भारी किताबों का बोझ भी घट सकता है। ई-बुक में पाठ्य सामग्री के साथ वीडियो, क्विज़ और अतिरिक्त अध्ययन संसाधन भी शामिल रहते हैं। इस तरह पूरी पढ़ाई एक डिजिटल प्लेटफॉर्म पर सिमट जाती है।
इस व्यवस्था का लक्ष्य पढ़ाई को निरंतर और लचीला बनाना है। छात्र कक्षा में पढ़ाए गए पाठ को घर पर भी दोहरा सकते हैं। AI आधारित ट्यूटर छात्रों को उनकी समझ के अनुसार मार्गदर्शन देता है, अलग-अलग भाषाओं में सहायता कर सकता है और व्यक्तिगत अध्ययन पथ सुझाता है। इससे रटने की बजाय समझ पर आधारित सीखने को बढ़ावा देने की कोशिश की जा रही है।
मॉडल में शिक्षकों की भूमिका को भी सशक्त बनाने पर जोर है। ऑटोमेटेड मूल्यांकन, रियल-टाइम प्रदर्शन रिपोर्ट और प्रशासनिक कार्यों में कमी जैसे फीचर शिक्षकों को पढ़ाने पर अधिक ध्यान केंद्रित करने में मदद करते हैं। साथ ही, स्कूल प्रबंधन और अभिभावकों को भी विद्यार्थियों की प्रगति की जानकारी तुरंत मिल सकती है, जिससे समय पर सहयोग संभव हो।
हालांकि यह पहल अभी शुरुआती चरण में है और सीमित स्कूलों में लागू की गई है, लेकिन इसकी अवधारणा भविष्य की डिजिटल कक्षा की झलक देती है। यदि इसे बड़े स्तर पर अपनाया गया, तो यह शिक्षा को अधिक व्यक्तिगत, सुगम और प्रभावी बनाने के साथ-साथ छात्रों के बस्ते का बोझ भी कम कर सकती है।