आयुष महिला डॉक्टर से जुड़े हिजाब विवाद में फिर उठे नीतीश की सेहत पर सवाल, नियुक्ति लेने से डॉक्टर का इंकार—विमर्श जारी

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बिहार की राजनीति एक बार फिर नीतीश कुमार के इर्द-गिर्द घूम रही है, लेकिन इस बार चर्चा सत्ता या रणनीति की नहीं, बल्कि उनकी शारीरिक और मानसिक स्थिति को लेकर है। सवाल केवल एक व्यक्ति की सेहत का नहीं है, बल्कि उस पूरे सामाजिक मानस का भी है, जिसे अक्सर “हिंदी पट्टी” कहा जाता है। क्या दोनों एक ही तरह की बीमारी से जूझ रहे हैं, या समस्याएं अलग-अलग हैं? और अगर अलग हैं, तो ज़्यादा अस्वस्थ कौन है—नेता या समाज? यही प्रश्न गंभीर आत्ममंथन की मांग करता है।

हालिया घटनाक्रम की शुरुआत उस समय हुई, जब बिहार में नवनियुक्त आयुष डॉक्टरों को नियुक्ति पत्र सौंपे जा रहे थे। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार वरिष्ठ मंत्रियों के साथ मंच पर मौजूद थे। इसी दौरान एक युवा मुस्लिम महिला डॉक्टर भी नियुक्ति पत्र लेने आगे आई। मुख्यमंत्री द्वारा सार्वजनिक मंच पर उसके चेहरे से नकाब हटाने की कोशिश की गई, जिसे व्यापक रूप से आपत्तिजनक माना गया।

यदि ऐसी घटना दशकों पहले घटती, तो शायद समाज इसे उतनी गंभीरता से न लेता। तब न लैंगिक संवेदनशीलता पर खुली चर्चा थी, न कार्यस्थल पर सम्मान और सुरक्षा से जुड़े स्पष्ट कानून। महिलाएं अक्सर अपमान, फब्तियों और शारीरिक असहजता को चुपचाप सहने को मजबूर रहती थीं। लेकिन समय बदला है। अब कानून हैं, शिकायत की व्यवस्था है, और जवाबदेही भी तय होती है।

आज की कानूनी और सामाजिक समझ के अनुसार, बिना सहमति किसी महिला के साथ ऐसा व्यवहार स्पष्ट रूप से उत्पीड़न की श्रेणी में आता है। इस मामले में पीड़िता के पास न केवल नैतिक, बल्कि कानूनी अधिकार भी है। लेकिन इससे बड़ा सवाल यह है कि क्या यह पहली बार है जब नीतीश कुमार का व्यवहार इस तरह चर्चा में आया है? जवाब है—नहीं।

पिछले कुछ वर्षों में कई सार्वजनिक अवसरों पर उनके व्यवहार को लेकर असहज करने वाले दृश्य सामने आए हैं। ऐसे वीडियो उपलब्ध हैं जिनमें वे महिलाओं के साथ असामान्य रूप से आक्रामक या असंतुलित हाव-भाव में दिखाई देते हैं। फूलों की माला पहनाने जैसे सामान्य शिष्टाचार के क्षण भी कई बार अजीब दृश्य में बदलते नजर आए।

बिहार विधानसभा में परिवार नियोजन पर दिया गया उनका एक बयान भी लंबे समय तक विवाद में रहा। उस वक्त सदन में जिस तरह से निजी और अंतरंग संदर्भों का उल्लेख किया गया, उसने न केवल विपक्ष बल्कि समाज के बड़े हिस्से को असहज कर दिया। इस तरह की भाषा और प्रस्तुति किसी संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति से अपेक्षित नहीं मानी जाती।

यह पूरा व्यवहार केवल अशिष्टता या व्यक्तिगत कुंठा कहकर नहीं समझा जा सकता। मनोविज्ञान और चिकित्सा विज्ञान में यह माना जाता है कि उम्र बढ़ने के साथ, विशेषकर डिमेंशिया या अल्ज़ाइमर जैसी स्थितियों में, व्यक्ति के व्यवहार पर नियंत्रण कम हो सकता है। निर्णय लेने और सामाजिक मर्यादा समझने वाले मस्तिष्क के हिस्सों के प्रभावित होने पर ऐसे लक्षण दिख सकते हैं, जिन्हें विशेषज्ञ “व्यवहारिक अवरोधहीनता” कहते हैं।

नीतीश कुमार के सक्रिय राजनीतिक जीवन का शुरुआती दौर मानसिक रूप से काफी संतुलित माना जाता रहा है। उनके अतीत में ऐसा कोई रिकॉर्ड नहीं रहा, जिससे उन्हें जानबूझकर असंवेदनशील या यौन अपराधी की श्रेणी में रखा जा सके। यही वजह है कि मौजूदा स्थिति कई लोगों के भीतर आलोचना के साथ-साथ करुणा का भाव भी पैदा करती है।

व्यक्तिगत जीवन में वे पहले ही काफी अकेले दिखाई देते हैं—जीवनसाथी का वर्षों पहले निधन, परिवार से सीमित सार्वजनिक जुड़ाव और सत्ता ही शायद उनका एकमात्र सहारा। ऐसे में यह सवाल उठता है कि क्या उन्हें आलोचना से ज़्यादा चिकित्सा और मानवीय देखभाल की आवश्यकता है।

लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। उनके व्यवहार पर समाज और राजनीति की प्रतिक्रियाएं कहीं ज़्यादा चिंताजनक तस्वीर पेश करती हैं। जब वे एक राजनीतिक खेमे में होते हैं, तो वही आचरण आलोचना का विषय बनता है; सत्ता संतुलन बदलते ही वही व्यक्ति महिला हितैषी घोषित कर दिया जाता है। नैतिकता राजनीतिक सुविधा के अनुसार बदलती दिखती है।

इस पूरे प्रकरण में एक मुस्लिम महिला का केंद्र में होना, समाज के एक बड़े हिस्से के लिए उत्सव का कारण बन गया। सोशल मीडिया से लेकर टीवी स्टूडियो तक, जिस भाषा और मानसिकता का प्रदर्शन हुआ, उसने यह साफ कर दिया कि समस्या केवल एक नेता तक सीमित नहीं है। यह गहरी सामाजिक बीमारी का संकेत है—वह बीमारी, जिसमें पीड़ित की पहचान देखकर संवेदनाएं तय होती हैं।

किसी की इच्छा के विरुद्ध नकाब हटाने को “क्रांतिकारी कदम” बताना उतना ही विकृत तर्क है, जितना किसी हिंसा को सामाजिक सुधार के नाम पर正 ठहराना। यदि जबरदस्ती को प्रगतिशीलता कहा जाएगा, तो फिर मर्यादा, सहमति और सम्मान का अर्थ ही क्या रह जाएगा?

अंततः, यह कहा जा सकता है कि नीतीश कुमार बीमार हो सकते हैं—शायद शारीरिक रूप से अधिक, मानसिक रूप से कम। लेकिन समाज एक कहीं अधिक गहरी और स्वैच्छिक मानसिक बीमारी से ग्रस्त है। यह वही सामूहिक उन्माद है, जिसने इतिहास में कई बार मानवता को अंधे रास्तों पर धकेला है। फर्क बस इतना है कि इस बार आईना हमारे सामने है—और सवाल यह है कि क्या हम उसमें देखने का साहस रखते हैं?

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