धनबाद (DHANBAD): सिंदरी के शहरपुरा स्थित शिव मंदिर परिसर में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के चौथे दिन का वातावरण भक्ति और आध्यात्मिक उत्साह से परिपूर्ण रहा। कथा के दौरान सुश्री ब्रज प्रिया किशोरी जी ने श्रीकृष्ण के बाल्यकाल से जुड़े अनेक प्रसंगों का ऐसा मार्मिक वर्णन किया कि उपस्थित लोग भाव-विभोर हो उठे।
उन्होंने भगवान कृष्ण की लीलाओं को केवल धार्मिक कथा न बताते हुए यह संदेश भी दिया कि सत्ता, शक्ति या पद यदि अहंकार में डूब जाए, तो वही प्रवृत्ति राक्षसी कहलाती है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि कंस ने सत्ता के मद में प्रजा का हित भूल कर पाप का मार्ग चुना और इसी अंहकार ने उसे विनाश की ओर धकेल दिया।
कथावाचन के दौरान पुतना प्रसंग का भावपूर्ण चित्रण किया गया—जहां बालक कृष्ण को हानि पहुंचाने के उद्देश्य से भेजी गई पुतना अपनी ही दुष्टता का अंत स्वयं झेलती है, जबकि भगवान को कोई आंच नहीं आती। सुश्री किशोरी जी ने कहा कि जो भी व्यक्ति दूसरों को कष्ट पहुंचाने का प्रयास करता है, अंततः उसका ही पतन होता है।
बाल लीलाओं का वर्णन करते हुए उन्होंने यशोदा मैया द्वारा कृष्ण को पंचगव्य से स्नान कराने, माखन-चोरी की मनोहर घटनाओं और कृष्ण के मुख में विराट सृष्टि-दर्शन के प्रसंग को विस्तार से समझाया। उपस्थित भक्त जब यह सुन रहे थे, मानो उस दिव्य दृश्य को स्वयं अपनी आंखों से देख रहे हों।
कथावाचिका ने आज की युवा पीढ़ी को उद्बोधित करते हुए कहा कि धार्मिक ग्रंथों—रामायण, श्रीमद्भागवत, उपनिषद आदि—का अध्ययन और श्रवण मन में ऐसी आंतरिक शांति देता है, जो बाहरी वस्तुओं से कभी नहीं मिल सकती। उन्होंने कहा कि भौतिक सुख सीमित और क्षणिक होते हैं, लेकिन अध्यात्मिक ज्ञान जीवन को स्थायित्व और उद्देश्य देता है।
उन्होंने यह भी बताया कि भगवान का स्मरण केवल पूजा के समय ही नहीं, बल्कि दैनिक कार्य करते हुए भी मन ही मन किया जा सकता है। यही साधना धीरे-धीरे मन को शांत कर भगवान के निकट ले जाती है।
श्रीकृष्ण की अनेक लीलाओं के साथ-साथ गोवर्धन पूजा का वर्णन भी अत्यंत मनोरम ढंग से किया गया। कथा के बीच-बीच में भजनों के मधुर स्वर वातावरण में गूंजते रहे, जिससे भक्तगण ‘राधे-राधे’, ‘जय श्री कृष्ण’ और ‘जय श्री राम’ के उद्घोषों के साथ भाव-विभोर होते रहे। यहां तक कि मंदिर परिसर से बाहर बाजार में बैठे दुकानदार भी कथा के भक्ति-संगीत से आकर्षित होकर शांत भाव से सुनने लगे।
कार्यक्रम में यजमान अमोद कुमार सिंह व उनकी धर्मपत्नी उषा सिंह सहित भारी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे, जो कथा के अंत तक भक्ति-सागर में डूबे रहे।